कुमारी स्वर्णलता
बिहार में लोकसभा एवं विधानसभा चुनावों के दौरान महिला मतदाताओं की भागीदारी में निरंतर वृद्धि देखी गई है। यह परिवर्तन न केवल लोकतांत्रिक प्रक्रिया की मजबूती का संकेत है, बल्कि राज्य की सामाजिक-आर्थिक संरचना में आ रहे सकारात्मक बदलावों को भी दर्शाता है। हाल के वर्षों में कई चुनावों में महिला मतदान प्रतिशत पुरुषों के बराबर अथवा कुछ क्षेत्रों में उससे अधिक रहा है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि महिलाएँ अब राजनीतिक प्रक्रिया में अधिक सजग और सक्रिय भूमिका निभा रही हैं।
महिला मतदाताओं की प्राथमिकताओं में शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सुरक्षा, सामाजिक कल्याण योजनाएँ, रोजगार के अवसर, स्वच्छ पेयजल तथा बिजली जैसी बुनियादी सुविधाएँ प्रमुख हैं। बिहार सरकार एवं केंद्र सरकार द्वारा चलाई गई योजनाएँ- जैसे साइकिल योजना, छात्रवृत्ति, स्वयं सहायता समूह (जीविका), उज्ज्वला योजना तथा स्वास्थ्य बीमा- महिलाओं के राजनीतिक दृष्टिकोण को प्रभावित करती रही हैं। ये योजनाएँ महिलाओं के दैनिक जीवन से सीधे जुड़ी होने के कारण मतदान व्यवहार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
महिला मतदाताओं की बढ़ती भागीदारी का चुनावी परिणामों पर भी स्पष्ट प्रभाव पड़ा है। कई निर्वाचन क्षेत्रों में महिलाओं के संगठित मतदान ने सत्ता परिवर्तन, उम्मीदवारों की जीत-हार तथा नीतिगत प्राथमिकताओं को प्रभावित किया है। राजनीतिक दल अब महिला मतदाताओं को एक निर्णायक वर्ग मानकर अपने घोषणापत्रों में महिला-केंद्रित मुद्दों को प्रमुखता से शामिल कर रहे हैं। इससे नीति-निर्माण में लैंगिक संवेदनशीलता बढ़ी है।
कुल मिलाकर, बिहार में महिला मतदाताओं की भागीदारी लोकतंत्र को अधिक समावेशी बना रही है। उनकी प्राथमिकताएँ विकासोन्मुखी और सामाजिक न्याय पर आधारित हैं, जिनका प्रभाव न केवल चुनावी राजनीति पर बल्कि शासन की दिशा और गुणवत्ता पर भी पड़ रहा है। भविष्य में महिला राजनीतिक जागरूकता के और सुदृढ़ होने से बिहार की लोकतांत्रिक प्रक्रिया और अधिक मजबूत होने की संभावना है।
Pages: 607-611 | 203 Views 105 Downloads