राजवीर सिंह ओझा
भारतीय ज्ञान परंपरा (Bhartiya Gyaan Parampara) में प्राणियों से संबंधित ज्ञान केवल जैव-विज्ञान तक सीमित नहीं है, बल्कि धार्मिक, सामाजिक, औषधीय, पारिस्थितिक एवं सांस्कृतिक स्तर पर गहराई से जुड़ा है । एथ्नो-ज़ूलॉजी (Ethno-Zoology) वह शाखा जिसके अंतर्गत मानव समुदायों द्वारा पारंपरिक रूप से अर्जित प्राणि-सम्बन्धी ज्ञान, उनके उपयोग, व्यवहार, संरक्षण तथा सांस्कृतिक प्रतीकात्मकता का अध्ययन किया जाता है उसे एथ्नोजूलोजी कहते है । भारतीय ग्रंथों-ऋग्वेद, अथर्ववेद, पंचतंत्र, मनुस्मृति, चरक-संहिता, सुश्रुत-संहिता, शालिहोत्र संहिता आदि में स्तनधारी, पक्षी, सरीसृप, कीट, मछली तथा पशुपालन आदि का व्यवस्थित वर्णन मिलता है, जो आधुनिक प्राणिविज्ञान के कई सिद्धांतों-टैक्सोनॉमी, इकोलॉजी, एथोलॉजी, एम्ब्रायोलॉजी से मिलता जुलता है । भारत की आदिवासी और ग्रामीण परंपराओं में मधुमक्खी पालन बिना छत्ते को नष्ट किए, सांपों का गैर-हिंसात्मक संरक्षण, पशु-चिकित्सा में पंचगव्य तथा जड़ी-बूटियों का प्रयोग, मौसम पूर्वानुमान के लिए कीटों/ पक्षियों के व्यवहार का उपयोग, तथा पवित्र पशु-आस्था (गाय, नाग, मोर, गरुड़) जैसी प्रथाएँ आज “पर्यावरण सरक्षण” और “सतत् विकास” (Sustainable Development) की आधारशिला मानी जाती हैं । इस शोध-पत्र में प्राचीन भारतीय प्राणि-ज्ञान, जनजातीय ज्ञान-संरचना, भारतीय दार्शनिक संरक्षण मूल्यों तथा आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान के बीच सेतु स्थापित करने का प्रयत्न किया गया है साथ ही यह प्रदर्शित किया गया है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 (NEP-2020) के अंतर्गत भारतीय ज्ञान प्रणाली (IKS) को आधुनिक जीवन-विज्ञान में पुनर्स्थापित किया जा सकता है ।
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