अनुपम कुमार सिंह, सपना मिश्रा
बिहार भारत का एक प्रमुख कृषि प्रधान राज्य है। यहां जल संसाधन, अर्थव्यवस्था और जनजीवन का मुख्य आधार है। जलवायु परिवर्तन और तीव्र जनसंख्या वृद्धि वर्तमान समय में बिहार के लिए दोहरा दवाब व समस्या के रूप में परिलक्षित है। बिहार में पर्याप्त नदी प्रणालियों के होने के बावजूद भी 94 प्रतिशत घरेलू परिवारों और कृषि उपयोग दोनों के लिए भूजल या भूमिगत जल पर अत्यधिक निर्भरता है। यह निर्भरता इसे जलवायु परिवर्तन के सन्दर्भ में और अधिक संवेदनशील बनाती है। जलवायु परिवर्तन, भूमंडलीय तापन से तापमान में वृद्धि, अनियमित वर्षा की प्रवृति, सूखे और बाढ़ की बारंबारता तथा कई चरम मौसमी घटनाओं की उच्च आवृत्ति बिहार के लिए एक गंभीर समस्या है। विभिन्न अध्ययनों से पता चलता है कि बिहार में प्रति व्यक्ति भूजल की उपलब्धता निरंतर कम होती जा रही है और अगर यही प्रवृति रही तो 2051 तक संभावित रूप से 13 लीटर प्रति व्यक्ति प्रतिदिन के स्तर पर गिर सकती है जो कि 40 लीटर प्रति व्यक्ति प्रतिदिन के राष्ट्रीय मानक से बहुत ही कम है। भूजल में आर्सेनिक, फ्लोराइड और लोहे के प्रदूषक जल गुणवत्ता की समस्या को भी बढ़ा रहे हैं। इस अध्ययन का मुख्य उद्देश्य जलवायु परिवर्तन का मूल्यांकन, समाधान व राज्य स्तर पर नीतिगत निर्णयों को मजबूत करना है। इस अध्ययन में प्रमुखता से द्वितीयक स्रोतों का प्रयोग किया गया है जिसमें मौसम विभाग, जल संसाधन विभाग, आर्थिक सर्वेक्षण, आईपीसीसी रिपोर्ट, विविध शोध पत्रों आदि को शामिल किया गया है। इन उद्देश्यों की पूर्ति हेतु विश्लेषणात्मक, तुलनात्मक तथा ऐतिहासिक विधियों का प्रयोग किया गया है। जल संसाधन पर जलवायु परिवर्तन की समस्या के समाधान के लिए बिहार जैसे राज्य को एक बहुआयामी दृष्टिकोण की जरूरत है। इसमें एकीकृत जल प्रबंधन, पारंपरिक जल संरक्षण प्रणाली के पुनरुत्थान के साथ-साथ नवीन तकनीकों को शामिल किया जाना है। जल जीवन हरियाली मिशन, विश्व बैंक द्वारा समर्थित बिहार जल सुरक्षा और सिंचाई आधुनिकीकरण परियोजना, जलवायु अनुकूल और कम कार्बन विकास पथ रणनीति सहित कई ऐसे सरकारी पहल हैं, जो जल के बुनियादी ढांचों में सुधार कर रहे हैं। अतः इन सारे कार्यों को बेहतर तरीके से कार्यान्वयन की आवश्यकता है ताकि बिहार सतत विकास के लक्ष्यों को पूर्ण कर सके।
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