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International Journal of Arts, Humanities and Social Studies
Peer Reviewed Journal

Vol. 7, Issue 2, Part A (2025)

सामाजिक न्याय, समानता और मधु लिमये की वैचारिक विरासत

Author(s):

दीपांकुर लाल

Abstract:

यह अध्ययन मधु लिमये की वैचारिक विरासत का सामाजिक न्याय और समानता के संदर्भ में विश्लेषण करता है। मधु लिमये न केवल एक प्रखर समाजवादी विचारक थे, बल्कि उन्होंने भारतीय लोकतंत्र को वैचारिक गहराई और नैतिक दिशा प्रदान की। उनका मानना था कि केवल राजनीतिक स्वतंत्रता पर्याप्त नहीं है; जब तक समाज के हाशिए पर खड़े वर्गों को सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक समानता नहीं मिलती, तब तक स्वतंत्रता अधूरी है। उन्होंने समाजवाद को केवल आर्थिक नीतियों का विकल्प न मानते हुए उसे सामाजिक पुनर्गठन और समावेशिता का औजार माना। जातिवाद, पूंजीवादी केंद्रीकरण और सत्ता के केंद्रीकरण का उन्होंने तीव्र विरोध किया। संसद में उनके हस्तक्षेप, लेखन और जनआंदोलनों के माध्यम से उन्होंने वंचित वर्गों के लिए आवाज़ बुलंद की। मधु लिमये का दृष्टिकोण भारत में समाजवादी विचारधारा को व्यावहारिक राजनीति से जोड़ने का सफल प्रयास था। इस शोध के माध्यम से यह स्पष्ट होता है कि मधु लिमये की वैचारिक विरासत आज भी सामाजिक न्याय और समानता की दिशा में नीति-निर्माण और जनसंघर्षों के लिए प्रासंगिक है। वर्तमान सामाजिक विषमताओं और लोकतांत्रिक क्षरण के दौर में उनके विचार न केवल प्रेरक हैं, बल्कि वैकल्पिक राजनीति की दिशा में मार्गदर्शक भी।

Pages: 57-59  |  480 Views  144 Downloads


International Journal of Arts, Humanities and Social Studies
How to cite this article:
दीपांकुर लाल. सामाजिक न्याय, समानता और मधु लिमये की वैचारिक विरासत. Int. J. Arts Humanit. Social Stud. 2025;7(2):57-59. DOI: 10.33545/26648652.2025.v7.i2a.282
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